रविवार, 4 सितंबर 2011

ये लम्हे भी  यूँही गुज़र  जाने के गम हैं 
अभी  तो  बेशुमार  आँखें  यहाँ  नम  हैं

उतारो  उन को जो  सर  पर  हैं  जा बैठे 
बता दो अपने बाजुओं में कितना  दम है 

 है जो उसे भी लूट कर ले जाएँगे एक रोज़ 
फिर भी तो  बेज़ुबान  ख़ामोश  से हम हैं 

बदलना  दूसरों को ही  क्यूँ  इत ना ज़रूरी है 
झाँक अपने अन्दर भी क्या ऐब कुछ कम हैं
  

1 टिप्पणी:

  1. बदलना दूसरों को ही क्यूँ इत ना ज़रूरी है
    झाँक अपने अन्दर भी क्या ऐब कुछ कम हैं

    bahut khoob , blog kee phli post hi lazvab , bdhaai svikaar kren

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