बुधवार, 30 नवंबर 2011

दर्द नहीं पिघले

चाँद तारे , नए निकले
क़ाफ़िर दर्द कहाँ पिघले

जो मेरी आपबीती थी
तेरी पहचान थी पगले

था गहरा व् समुन्दर सा
थे हम भी डूबकर निकले

कौन सुनता है क्या बोले
ये फ़रियादी के दो जुमले

रोया दिल तो खुश मैं थी
शायद मर्ज़ कुछ संभले!

9 टिप्‍पणियां:

  1. रोया दिल तो खुश मैं थी
    शायद मर्ज़ कुछ संभले!

    सुंदर अतिसुंदर !!

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  2. तमाम अशार बेहतरीन
    आनंद आ गया...
    सादर...

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  3. बेहतरीन सुन्दर भावो की अभिवयक्ति.....

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  4. रोया दिल तो खुश मैं थी
    शायद मर्ज़ कुछ संभले!

    Bahut Badhiya...Behtreen Panktiyan

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